I AM NOT THE BEST, BUT I AM NOT THE REST.

Thursday, March 17, 2016

Success Tips

Success Tips

तो आइये जानते हैं उन तीन ज़रूरी बातों को जो हमें सफलता दिला सकती हैं :
पहली बात:  1 line का लक्ष्य बनाएं

सफलता क्या है?

अपने लक्ष्य को पाना ही सफलता है. इसलिए अगर सफल होना है तो पहले आपको अपना एक लक्ष्य निर्धारित करना होगा.

5 साल पहले जब मैंने AKC शुरू किया था तभी मैंने तय कर लिया था कि एक दिन मैं अच्छीखबर पर “१ लाख पेज व्यूज पर डे” का goal achieve करूँगा और उसी को अपनी सफलता मानूंगा, and it happened!

सफलता पाने के लिए सबसे पहला step यही है की आप clearly define करिये कि आपके लिए सफलता का मतलब क्या है ?

कई बार लोग कहते हैं, “ I want to be a successful person?” पर उनके दिमाग में इस बात की clarity नहीं होती कि successful person होने का मतलब क्या है ?

हो सकता है आपके लिए इसका मतलब हो – “ एक अच्छा सा घर…अच्छी सी नौकरी…अच्छी सी family…” but ये success की बहुत generalized definition हुई…. कौन जानता है किसके लिए क्या “अच्छा ” है. इसलिए आप अपने लिए Success की एक clear cut and concise definition तैयार करिए…ऐसी definition जिसे आप बार -बार अपने दिमाग में repeat कर सकें, जिसे बोलते ही आपकी आँखों में चमक आ जाये जो आपको एक challenge के साथ- साथ एक achievement का भी एहसास करा सके.

For example:

5 साल पहले मेरे लिए ये definition थी —“ 1 lac page views per day”, 1 lac page views achieve करने से पहले ये छोटी सी line मैं हज़ारों बार लिख, सोच और महसूस कर चुका था और जब मैंने इसे पा लिया है तो अब अपने अगले लक्ष्य की और बढ़ रहा हूँ…वो क्या है इसके बारे में फिर कभी बात होगी. :)

आपको भी अपने लिए success को एक line में define करना होगा…ये कुछ भी हो सकता है —

For example: अगर Vijay Kumar को IAS officer बनना  है तो वो एक लाइन में अपना गोल बना सकता है –“ VIJAY KUMAR IAS OFFICER”

अगर उसे IIT में जाना है….” VIJAY KUMAR IITIAN”

अगर किसी को बहुत बड़ा Dancer बनना है -“दिल्ली का नंबर १ डांसर” etc.

Goal define करते समय इन बातों का ध्यान रखें :

Goal बड़ा बनाएं! कितना बड़ा ? उतना बड़ा जितना आप सोच सकते हैं और जिसे आप दिलो दिमाग से accept कर सकते हैं की हाँ अगर आप अपनी पूरी ताकत झोंक दें तो आप उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं!

For instance: कोई लक्ष्य बना सकता है “ मुझे दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनना है ” अगर वो इसे दिलो-जान से believe कर पा रहा है तो well and good लेकिन अगर नहीं कर पा रहा है तो उससे बेहतर होगा, “मुझे 10 करोड़ रूपये कमाने हैं ”

What I mean to say is कि आपका लक्ष्य आपको motivate करने वाला हो…वो ऐसा न हो कि उसे बोलते ही अंदर से आवाज़ आये…..” ये कहाँ हो पायेगा…” बल्कि उसे बोलते ही आप charged up महसूस करें…कि हाँ यही वो चीज है जो मुझे किसी भी कीमत पर चाहिए….YES यही करना है मुझे!

एक बात और जो ध्यान देने वाली है कि आपको “Goal” बनाना है “ Goals” नहीं. हो सकता है कुछ लोग इस बात से agree न करें पर मेरा मानना है की एक समय में आप सिर्फ और सिर्फ एक GOAL बनाइये. ख़ास तौर से वो लोग जो पहली बार किसी बड़ी सफलता का स्वाद चखना चाहते हैं…उन्हें goals के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए और सिर्फ और सिर्फ एक goal बनाना चाहिए. अगर आप अलग-अलग गोल्स को लेकर दुविधा में हैं तो उस एक गोल को चुनें जो आपकी life पर सबसे अधिक positive impact डाले, और फिर अपनी पूरी उर्जा उसी एक गोल को पाने में लगा दें!

बहुत पहले Goal से related मैंने एक पोस्ट लिखी थी – “जीवन में लक्ष्य का होना ज़रूरी क्यों है ?“. चाहें तो आप इसे पढ़ सकते हैं.
दूसरी बात: Focussed Hard Work करें

Goal बनाने के बाद दूसरा step है उस Goal पर focussed रहना और उसे achieve करने के लिए कड़ी मेहनत करना.

किसी चीज पर focussed रहने का क्या मतलब है ?

इस बात को समझाने के लिए मैं हमेशा Swami Vivekanand जी की कही ये बात quote करता हूँ –

    एक idea लो. उस idea को अपनी life बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस idea को जियो. अपने दिमाग, muscles, nerves, शरीर के हर हिस्से को उस आईडिया में डूब जाने दो, और बाकी सभी ideas को किनारे रख दो. यही सफल होने का तरीका है, यही वो तरीका है जिससे महान लोग निर्मित होते हैं.

Friends, ज्यादातर लोग life में इसलिए असलफल नही रह जाते क्योंकि उनके अंदर सफल होने की काबिलियत नहीं होती बल्कि वे इसलिए असफल हो जाते हैं क्योंकि वे लम्बे समय तक एक ही लक्ष्य पर अपना ध्यान नहीं लगा पाते.

अगर आपको सफल होना है तो आपको Focussed हो कर अपने goals का पीछा करना होगा…रास्ते में तमाम नयी opportunities आपको distract करने की कोशिश करेंगी…कोई business plan समझायेगा, तो कोई आपको जल्दी से अमीर बनने का रास्ता दिखायेगा … तो कोई अच्छी नौकरी का offer देगा….पर आपको इन सबको ठुकराना है.

जब मैं AKC पे काम कर रहा था तो इस बीच मैंने कई दूसरी opportunities छोड़ीं… which included a very good job offer, विदेश जाने का मौका, etc. हो सकता है आपको लगे कि मेरे लिए ये सब miss करना कठिन रहा होगा…but frankly ये बहुत आसान था….जब आप अपने लक्ष्य को लेकर passionate होते हैं तो बाकि सब बेकार लगता है और उन्हें छोड़ना या हाथ से जाने देना बहुत आसान होता है!

दोस्तों, चाहे जितनी भी distractions आ जाएं आपको सिर्फ और सिर्फ अपना लक्ष्य प्राप्त करना है और कुछ नहीं! फिर दूसरी चीजें चाहे कितनी भी attractive हों, उसमे कितना ही पैसा हो…कितनी ही शौहरत हो….नहीं चाहिए….मुझे अपनी life में सिर्फ और सिर्फ एक चीज चाहिए……मेरा लक्ष्य और कुछ नहीं!

और ये लक्ष्य मिलेगा कड़ी मेहनत से…. बहुत से लोग SMART work की बात करते हैं…but don’t confuse it with Easy Work…. SMART work actually means…कि आप Hard work smartly करते हैं.

Light bulb के inventor Edison ने सौ साल पहले कहा था —

    There is no substitute for hard work. / कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है.

और यकीन जानिये अभी तक इसका कोई विकल्प नहीं मिल पाया है!

इसलिए अगर आपको अपना लक्ष्य प्राप्त करना है तो कड़ी मेहनत करनी होगी…लगातार…हर रोज…जब तक आपका लक्ष्य न मिल जाए!

आपको time wasters को किनारे करना होगा…mobile switch off करना होगा… facebook signout करना होगा, whatsapp disable करना होगा…दोस्तों को… family members को “ना” करना सीखना होगा…आपको सुबह जल्दी उठना होगा या रात को देर तक काम करना होगा…आपको अपना हर लम्हा लक्ष्य को पाने में लगाना होगा and believe me जब आप ऐसा करेंगे तो बड़े से बड़ा लक्ष्य भी आपको achievable लगने लगेगा!

आज तक जितने भी achievers हुए हैं-

महात्मा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक
अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर तक
सानिया से लेकर साइना तक….

हर किसी ने बड़ी मेहनत की है हर किसी ने कड़ी मेहनत की है….success की लड़ाई में कड़ी मेहनत ही आपका ब्रह्मास्त्र है..इसकी ताकत के आगे पहाड़ों तक को झुकना पड़ता है….इसका इस्तेमाल करिये…सारे challenges…सारी अड़चने… सारी बाधाओं को अपने सामने झुका  दीजिये और सफलता को अपनी मुट्ठी में भर लीजिये!

आप Focus पे लिखी मेरी ये पोस्ट भी पढ़ सकते हैं : सफलता के लिए ज़रूरी है Focus!
तीसरी और आखिरी बात: Enthusiasm बनाये रखें

आप अपने goal को लेकर clear हैं…आप focussed hard work भी कर रहे हैं पर एक चीज और है जो success पाने के लिए मुझे बेहद ज़रूरी लगती है…
और वो चीज है एन्थुजीऐजम…यानि जोश या उत्साह.

यहाँ जोश का मतलब नाचना – गाना या super excited होकर अपनी emotions show करना नहीं है…जोश का मतलब internally charged up होने से है…
इसका मतलब अपने goal को लेकर अंदर से अच्छा feel करने से है…अपने efforts को लेकर उत्साहित रहने से है…जब आदमी जोश में काम कर रहा होता है तो वो extra efforts डालने के लिए तैयार रहता है…वो अपने लक्ष्य को पाने के लिए अनदेखे रास्तों पर चलने को तैयार रहता है, वो सिर्फ conventional wisdom पर नही चलता बल्कि नए innovative तरीकों को अपनाने के लिए भी ready रहता है…उसका दिमाग सोचता रहता है कि मैं कैसे अपने mission को possible बना सकता हूँ… मैं कैसे अपने dreams को reality में convert कर सकता हूँ!

Ralph Waldo Emerson ने कहा है-

    Nothing great was ever achieved without enthusiasm. / बिना उत्साह के कभी कोई महान उपलब्धि हासिल नहीं की गयी है.

इसलिए अपने लक्ष्य को लेकर अक्सर उत्साहित रहे.. अक्सर इसलिए क्योंकि हमेशा ऐसा होना practical नहीं है, ना चाहते हुए भी situations circumstances आपका एनर्जी लेवल, आपका मोराल डाउन कर सकते हैं… that’s ok… ये सबके साथ होता है. बस ज़रूरत ये है कि आप फिर से उसी उत्साह उसी मोराल को वापस पा लें…और ऐसा करना तब थोड़ा आसान होगा जब आप अपना लक्ष्य ये देखकर नहीं बनाएं कि और लोग आपसे क्या चाहते हैं बल्कि ये सोचकर बनाएं कि आप खुद से अपने लिए क्या चाहते हैं!

इसके अलावा अपना उत्साह बरकरार रखने के लिए आप motivational books, videos और blogs का सहारा भी ले सकते हैं…आप कुछ mini-milestones decide कर सकते हैं और उसे अचीव करने पर celebrate कर सकते हैं…जो भी करें… जैसे भी करें पर अपना enthusiasm बनाये रखें… ऐसा करना बिना थके आपको आपके लक्ष्य के करीब पहुंचा देगा!

अंत में एक और चीज जो मैं गोल के बारे में कहना चाहता हूँ, वो ये कि अकसर Goal को Time Bound बनाने की सलाह दी जाती है, बहुत से cases में ये सही भी है…पर मुझे लगता है कि life के सबसे ज़रूरी goals को समय से नहीं बाँधा जाना चाहिए…बल्कि उनका रिश्ता आपके उत्साह के साथ होना चाहिए!

ये मायने नहीं रखता की लक्ष्य का पीछा करते हुए 1 साल बीता…दो साल बीता या दस साल बीता…अगर उत्साह ज़िंदा है तो लक्ष्य को पाने की मेरी लड़ाई ज़िंदा है…..और जब तक मेरी लड़ाई ज़िंदा है तब तक मैं जीत सकता हूँ ….

मैं रुकुंगा नहीं मैं झुकूंगा नहीं…
लड़खड़ाउं-गिरुं पर थमूंगा नहीं…
है जोश मुझमें मैं चलता रहूँगा…
जो है लक्ष्य मेरा मैं पाकर रहूँगा…

High Blood Pressure

उच्च रक्तचाप या High Blood Pressure (Hypertension) से जुड़े सवालों के जवाब !
आज दुनिया में भारत सबसे युवा देश है। भारत की लगभग 65% जनसँख्या की उम्र 35 या उससे कम हैं।भारत इतना युवा देश होने के बाद सबसे स्वस्थ देश होना चाहिए था पर असल में तस्वीर कुछ और ही हैं। युवाओं में बढ़ने वाला तनाव और मोटापे की समस्या के कारण 20 से 25 वर्ष के आयु में ही डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या निर्माण हो रही हैं।
आज इस लेख में हम उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब दे रहे हैं।

1. उच्च रक्तचाप या High Blood Pressure / Hypertension किसे कहते हैं ?

हमारे शरीर में रक्त, रक्त नलिकाओं में बहते समय रक्त नलिकाओं के दिवार पर जो दबाव निर्माण करता है उसे रक्तचाप या ब्लड प्रेशर कहा जाता हैं। सामान्यतः एक युवा स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 120/80 mmHg रहता हैं। अगर यह दबाव लगातार 140/90 mmHg या उससे अधिक रहता है तो उसे उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर कहा जाता हैं। समय पर हाई ब्लड प्रेशर का ईलाज न कराने से इस कारण ह्रदय रोग, स्ट्रोक और किडनी रोग जैसे गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।

2. ब्लड प्रेशर हमेशा दो अंकों में क्यों लिखा जाता हैं ? उनका क्या मतलब होता हैं ?

ब्लड प्रेशर की जांच करते समय दो घटनाये महत्वपूर्ण होती है और उन्ही दो घटनाओ के समय के दबाव को ब्लड प्रेशर में लिखे जाता हैं।
Systolic Blood Pressure : इसे सामान्य भाषा में ऊपर का रक्तचाप कहा जाता हैं। जब आपका ह्रदय धड़कता है तब रक्तनलिका में कितना दबाव निर्माण होता है यह इससे पता चलता हैं।
Diastolic Blood Pressure : इसे सामान्य भाषा में निचे का रक्तचाप कहा जाता हैं। जब आपका ह्रदय / दिल / Heart धड़कने के बाद शिथिल / relax होता है तब रक्तनलिकाओं में कितना दबाव रहता है यह इससे पता चलता हैं।

3. डॉक्टर के पास जाकर या घर पर ब्लड प्रेशर की जांच करते समय ब्लड प्रेशर सही आने के लिए मैंने किन बातों का ख्याल रखना चाहिए ?
ब्लड प्रेशर की जांच करना यह एक बेहद आसान और दर्दरहित प्रक्रिया है। आपका ब्लड प्रेशर सही तरह से मापा जाये इसके लिए आपने कुछ बातों का ख्याल रखना जरुरी हैं।
ब्लड प्रेशर की जांच करने से 30 मिनिट पहले तक कॉफी और धूम्रपान का सेवन न करे।
ब्लड प्रेशर गिनने के पहले अगर पेशाब लगी हो तो पेशाब करने के बाद ब्लड प्रेशर की जांच करे। अन्यथा ब्लड प्रेशर ज्यादा भी आ सकता हैं।

5 मिनिट शांत बैठने के बाद ही ब्लड प्रेशर की जांच करे। 
ब्लड प्रेशर गिनते समय किसी प्रकार के तनाव या चिंता में न रहे। अक्सर कुछ व्यक्तिओ का ब्लड प्रेशर डॉक्टर के केबिन में जाने के बाद बढ़ जाता हैं।
हमेशा 3 बार ब्लड प्रेशर की जांच करे और उनका औसत निकाले।
अगर एक हाथ में ब्लड प्रेशर सामान्य आता है तो दूसरे हाथ में भी ब्लड प्रेशर गिने और जिस हाथ में अधिक ब्लड प्रेशर आता है उस हाथ में ही आगे से ब्लड प्रेशर की जांच करे।
अगर आपको कोई दवा शुरू है तो उसकी जानकारी डॉक्टर को देना चाहिए। ऐसी कुछ दवाए है जिनको लेने से ब्लड प्रेशर बढ़ने की संभावना रहती हैं।
ब्लड प्रेशर की जांच होने के बाद उसको अपने पास किसी कार्ड या किताब में तारीख, समय और स्तिथि (खड़े, लेटकर या बैठकर) के साथ लिखकर रिकॉर्ड बनाना चाहिए।

4. क्या मुझे हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी हो सकती हैं ?
उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी किसी भी व्यक्ति को हो सकती हैं। कुछ ऐसी बातें है जिनकी वजह से हाई ब्लड प्रेशर होने की संभावना अधिक होती है, जैसे की -
मोटापा
अधिक नमक या सोडियम युक्त आहार का सेवन करना
फल और सब्जियों से मिलनेवाला पोटैशियम का कम सेवन करना
व्यायाम का अभाव या आलस्य
अधिक शराब पीना या धूम्रपान करना
मधुमेह होना
आपके घर में किसी को हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी होना

5. मैं अपने ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में कैसे रख सकता हूँ ?
अगर आपका ब्लड प्रेशर बेहद ज्यादा है तो उसे नियंत्रण में लाने के लिए डॉक्टर आवश्यकता अनुसार अलग-अलग दवा का इस्तेमाल करते हैं। दवा के साथ आप आहार, व्यायाम और योग की मदत से अपने ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रख सकते हैं।
अपने वजन को नियंत्रण में रखे।
रोजाना अपने क्षमतानुसार व्यायाम करे।
योग विशेषज्ञ की सलाहनुसार योग और प्राणायाम करे।
समतोल आहार ले। आहार में नमक और सोडियम युक्त पदार्थों का प्रमाण अल्प रखे।
शराब और धूम्रपान न करे।
अगर आप मधुमेह के रोगी है तो अपनी ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखे।
अधिक समय तक बैठे न रहे और क्रियाशील रहे।
डॉक्टर की दी हुई दवा समय पर लेते रहे।

6. कौन सा ब्लड प्रेशर खतरनाक होता हैं ?
Systolic Blood Pressure (ऊपर का) और Diastolic Blood Pressure (निचे का) यह दोनों ही ब्लड प्रेशर का बढ़ना समान रूप से खतरनाक होते हैं। यह धारणा गलत है की केवल Diastolic Blood Pressure (निचे का) ही खतरनाक होता हैं। विशेष कर 50 वर्ष के ऊपर के व्यक्तिओं में Systolic Blood Pressure (ऊपर का) अधिक महत्वपूर्ण होता हैं।

7. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ने पर मुझे क्या लक्षण नजर आ सकते हैं ?
ब्लड प्रेशर बढ़ने के कोई विशेष लक्षण नहीं होते हैं और इसीलिए इसे शांत कातिल या Silent Killer भी कहा जाता हैं। ब्लड प्रेशर बढ़ने से न तो चक्कर आते, न सरदर्द होता है और ना ही नाक से खून निकलता हैं। ब्लड प्रेशर बढ़ने पर कोई विशेष लक्षण नजर नहीं आता है इसलिए कोई तकलीफ न होने पर भी वर्ष में एक बार अपने डॉक्टर के पास जाकर अपना ब्लड प्रेशर की जांच अवश्य करना चाहिए। अगर आपको ब्लड प्रेशर की बीमारी है तो डॉक्टर की सलाहनुसार दिए हुए समय पर नियमित जांच करते रहना चाहिए।

8. हाई ब्लड प्रेशर के क्या दुष्परिणाम हैं ?
लंबे समय तक ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में न रखने पर शरीर पर निचे दिए हुए गंभीर परिणाम हो सकते हैं :
रक्तनलिका में चर्बी जमना / Artherosclerosis : किसी प्रकार का कोई परिश्रम या व्यायाम न करना और साथ ही अधिक चर्बी युक्त आहार का सेवन करने से रक्त नलिकाओं में खून का थक्का या चर्बी जमना शुरू हो जाता हैं। हाई ब्लड प्रेशर के दबाव के कारण यह समस्या अधिक गंभीर हो जाती हैं।
ह्रदय रोग / Heart Disease : उच्च रक्तचाप के कारण ह्रदय कमजोर होना (Heart Failure), ह्रदय को पर्याप्त रक्त न मिलना (Ischemic Heart Disease) और ह्रदय का आकार बढ़ना जैसे गंभीर विकार निर्माण होने का खतरा रहता हैं।
गुर्दे के रोग / Kidney Disease : हाई ब्लड प्रेशर के कारण किडनी के अंदर की सूक्ष्म रक्त नलिकाए और रक्त को अशुद्धता साफ़ करनेवाले फ़िल्टर में खराबी आने से गंभीर किडनी विकार निर्माण हो सकते हैं।
आघात / Stroke : हाई ब्लड प्रेशर के कारण दिमाग के रक्त नलिकाओं में रक्त का थक्का ज़मने से दिमाग की किसी हिस्से को रक्त न मिलने से या उच्च ब्लड प्रेशर के दबाव से कोई रक्त नलिका के फटने से होनेवाले रक्तस्त्राव के कारण आघात / Brain stroke जैसे गंभीर स्तिथि निर्माण हो सकती हैं।
आँखों की समस्या / Eye Disease : हाई ब्लड प्रेशर के दबाव के कारन आँखों में रेटिना की सूक्ष्म रक्तवाहिनी को क्षति पहुचने से आँखों की रौशनी भी जा सकती हैं।

9. हाई ब्लड प्रेशर होने पर मुझे किस तरह का आहार लेना चाहिए ?
हाई ब्लड प्रेशर होने पर डॉक्टर आपको DASH आहार लेने की सलाह देते हैं। DASH का मतलब होता हैं Dietary Approach to Stop Hypertension यानि ऐसा आहार लेना जिससे की उच्च रक्तचाप को नियंत्रित किया जा सके। DASH में इन बातों का महत्व होता हैं :
आहार में फल, हरी पत्तेदार सब्जियों और कम फैट युक्त दुग्धजन्य आहार का अधिक समावेश करना।
आहार में अधिक saturated fat और cholesterol वाले पदार्थों का कम उपयोग करना। 
आहार में साबुत अनाज का अधिक उपयोग करना।
मिठाई और लाल मांस का कम प्रयोग करना।
आहार में मैग्नीशियम, पोटैशियम और कैल्शियम युक्त आहार का अधिक समावेश करना।
सोडियम युक्त आहार का कम समावेश करना।

10. मेरा ब्लड प्रेशर अब सामान्य हो गया है। क्या मैं अब दवा लेना बंद कर सकता हूँ।
हाई ब्लड प्रेशर के ज्यादातर मरीज यही गलती करते हैं। जिस तरह डायबिटीज के रोगियों में दवा लेकर ब्लड शुगर नियंत्रण में आने पर भी दवा लेना जरुरी होता है ठीक उसी तरह ब्लड प्रेशर नियंत्रण में आने पर भी दवा लेना जरुरी होता हैं। जब आप कोई दवा लेते हैं तो उस दवा के प्रकार के अनुसार उस दवा का असर रक्त में 12 से लेकर 72 घंटों तक रहता हैं, इसलिए कई बार दवा न लेने के बाद भी ब्लड प्रेशर के रोगियों में ब्लड प्रेशर सामान्य आ सकता हैं। कभी भी अपने मन से दवा बंद नहीं करनी चाहिए। आपकी दवा की मात्रा बढ़ाना, कम करना या बंद करने का फैसला डॉक्टर ही ले सकते हैं। अचानक दवा बंद करने के कारण कुछ समय बाद ब्लड प्रेशर काफी ज्यादा बढ़ने से दिमाग की छोटी नस फटने से लकवा भी हो सकता हैं।

Friday, February 5, 2016

દીકરી ...

દીકરી ...
👉 લગ્ન સમયે બધાનું બધામાં ઘ્યાન હોય છે પણ દીકરીની મનઃસ્થિતિની ખબર કોઈને પડતી નથી.
👉 કંકોત્રીમાં પોતાના નામ પછીના કૌંસમાં લખેલું નામ કદાચ છેલ્લી જ વાર પોતાની આઈડેન્ટીટી બતાવી રહ્યું છે... હવે નામની પાછળ બદલાતું નામ અને બદલાતી અટક સાથે વાતાવરણ પણ બદલાવવાનું છે.
👉 દીકરી કોઈને કશું જ
કહેવા માંગતી નથી. એટલે જ એ સાસરેથી પિયરમાં આવે છે ત્યારે પહેલાં ઘરના પાણીયારા માંથી જાતે ઊભી થઈને સ્ટીલના જૂના ગ્લાસમાં પાણી પીવે છે,
👉 હજુ પણ એને ઘરના કોક ખૂણેથી બાળપણ મળી આવે છે,
હજુપણ એને પપ્પાની આંગળી ઝાલીને ફરવાનું મન થતું હોય છે,
👉 સીડી પ્લેયરના મોટ્ટા અવાજમાં હીંચકા ખાવાનું મન એને આજે પણ થાય છે. પણ, હવે એ દીકરીની સાથે સાથે પત્નિ બની છે.
👉 ગઈકાલ સુધી જે દરેક ઈચ્છાઓ પૂરી કરાવીને જ જંપતી હતી આજે એ ઈચ્છાઓ પર કાબૂ મેળવતા શિખી ગઈ હોય છે કારણ કે દીકરી કોઈને કશું જ કહેવા માંગતી નથી!
👉 સુકાઈ ગયેલા આંસુનું માપ લિટરમાં નથી નીકળતું......!!
👉 પિતા પાસેથી નાની નાની હથેળીઓ પર હાથ મૂકીને નસીબ અજમાવવાના દિવસો 'છૂ' થઈ જાય છે!
👉 પોતાના જ ઘરમાં મહેમાન બનીને આવવાનું જેટલું દીકરી માટે અઘરું છે એટલું જ મહેમાન બનીને આવતી દીકરીને પોતાની સગ્ગી આંખોએ જોવાનું પણ અઘરું છે...
👉 દીકરો ખૂબ થાકીને ઘરે આવ્યો હશે અને ગમ્મે તેટલો મોટો હશે પણ એનો બાપ એને
અડધી રાત્રે ઊઠાડીને કામે મોકલશે... એ જ આશયથી કે દીકરો તો કાલે ફરીથી નિરાંતે ઊંઘી જશે
પણ,
દીકરી ઊંઘતી હશે તો પિતા એને ઉઠાડવાની હિંમત નહીં કરે...! કદાચ આ ઊંઘ ફરી ક્યારેય ન આવે તો?
👉 દીકરો પરણાવતી વખતે બાપ હોય એના કરતાં વધારે જુવાન બની જાય છે...
પણ,
દીકરી પરણાવતી વખતે એ અચાનક જ ઘરડો લાગવા માંડે છે... !!
👉 દીકરીનું લગન એટલે નદીને પાનેતર પહેરાવવાની ક્ષણો...!
👉 દીકરી એટલે ઈશ્વરે આપણને કરેલું કન્યાદાન..
👉 એક લીલા પાન ની અપેક્ષા હોય, પરંતુ આખી વસંત ઘરે આવે એ દીકરી.
👉 દીકરી એટલે માત્ર ઘર માં જ નહિ, હોઠ, હૈયે અને શ્વાસ માં સતત વસેલી વસંત ...
👉 દીકરી એટલે ખિસ્સામાં રાખેલું ચોમાસું ...
👉 દીકરી એટલે ઈશ્વર ના આશિર્વાદ નહિ ,
દીકરી એટલે આશિર્વાદમાં મળેલા ઈશ્વર ...

Wednesday, February 3, 2016

कैसे बनता है कोई extraordinary?


आर्डिनरी को एक्स्ट्राआर्डिनरी बनाना है तो क्या करना होगा ?

आर्डिनरी में एक्स्ट्रा जोड़ना होगा!

अगर एक ordinary student को extraordinary student बनना है तो उसे extra पढ़ाई करनी होगी ।

अगर एक ordinary player को extraordinary player बनना है तो उसे extra practice करनी होगी ।

अगर एक ordinary sales man को extraordinary sales man बनना है तो उसे extra मेहनत करनी होगी ।

Sportsman of the century का खिताब पाने वाले महान मुक्केबाज Muhammad Ali का कहना है –

मैं ट्रैनिंग के हर एक मिनट से नफरत करता था, लेकिन मैंने कहा, हार मत मानो। अभी सह लो और अपनी बाकी की ज़िन्दगी एक चैंपियन की तरह जियो।

तो क्या आज आप अपना extra देने को तैयार हैं, खुद को train करने के लिए तैयार हैं, extra effort करने पर होने वाले pain को सहने के लिए तैयार हैं ताकि आप अपनी बाकी की ज़िन्दगी एक champion की तरह जी सकें ?

याद रखिये extraordinary बनना talent का खेल नहीं है ये मेहनत का खेल है, ये सुबह 5 बजे उठ कर दौड़ने का खेल है ये रात -रात भर जाग कर पढ़ने का खेल है ये गर्मी -जाड़ा-बरसात हर मौसम में बाहर निकल कर customer से मिलने का खेल है।

दरअसल extraordinary बनना Input का खेल है…अगर input extraordinary होता है तो अपने आप ही output extraordinary हो जाता है।और input देना हमारे अपने हाथ में है, ऐसे में अगर हम अपने हाथ ही बाँध लें और किस्मत को दोष दें तो कुछ नहीं हो  सकता। हमें मुट्ठी कसनी होगी, खुद को तैयार करना होगा…हमें किसी भी कीमत पर ईश्वर के दिए इस जीवन को सार्थक बनाना होगा!

Extra कैसे दिया जाए?

हर कोई एक्स्ट्राआर्डिनरी नहीं होता क्योंकि हर कोई एक्स्ट्रा नहीं देता। और हर कोई एक्स्ट्रा इसलिए नहीं देता क्योंकि ऐसा करना आसान नहीं होता! ऐसा करने में बहुत मेहनत और self discipline की ज़रूरत होती है। पर अगर आपको लाइफ में कुछ meaningful हासिल करना है तो आपको अपना एक्स्ट्रा देना ही होगा। अगर आप अभी भी वही करते रहेंगे जो आज तक करते आये हैं तो आपको अभी भी वही मिलता रहेगा जो आज तक मिलता आया है।

Don’t accept it, इसे मंजूर मत करिए…अगर दुनिया में कोई और बड़ा काम कर सकता है तो आप भी कर सकते हैं, अगर कोई और अपने सपने पूरे कर सकता है तो आप भी कर सकते हैं।

ये आपका समय है इसे बेकार की चीजों में बर्वाद मत करिए याद रखिये ये जीवन समय से बना है और समय बर्वाद करने का मतलब जीवन बर्वाद करना है! अपनी आँखें खोलिए और ऐसा तमाम activities जो आपका समय बर्वाद करती हैं उनसे छुटकारा पाइए…घंटो फेसबुक पे बैठना टीवी से चिपके रहना, और बिस्तर में लेटे रहना आपको कुछ नहीं देगा, आपको उठना होगा, जागना होगा और अपने लक्ष्य का पीछा करना होगा…हर रोज…लगातार..जब तक वो मिल ना जाए!

दोस्तों, कुछ दिन पहले किसी ने AKC पे कमेन्ट किया था,

ज़िन्दगी इतनी छोटी है कि घटिया नहीं होनी चाहिए!

मुझे ये बात बहुत सही लगी। सच में  हमारी life को meaningful होना ही चाहिए। और इसे meaningful बनाने बाहर से कोई नहीं आने वाला ये हमारा अपना काम है और इसे हमें ही करना होगा…हमें खुद अपने भाग्य का विधाता बनना होगा ।

ये नए साल की शुरुआत है, भूल जाइए कल क्या हुआ, भूल जाइए की आप एक average student, player या salesman थे। बस इतना याद रखिये की अब तक जो इतना ordinary हुआ बस इसलिए हुआ क्योंकि आपने ऐसा होने दिया पर अब जो होगा वो extraordinary होगा क्योंकि आप अब अपनी लाइफ को एक्स्ट्राआर्डिनरी बनाएंगे ।


अब आप भीड़ का हिस्सा नहीं बनेंगे, अब आप एक mediocre life नहीं accept करेंगे, अब आप decide करेंगे की आपको life में करना क्या है और अपना पूरा focus बस उसी एक चीज को पाने में लगा देंगे। अब हर रोज आप अपने सपनो को  पूरा करने के लिए कुछ extra देंगे। और अपनी मेहनत से इस दुनिया में खुद के लिए एक जगह  बनाएंगे ….ऐसी जगह जिस पर आपको ही नहीं पूरी दुनिया को नाज़ हो ।

Tuesday, February 2, 2016

છોડવા જેવી સાત ટેવથી બનશે મેઘધનુષી જીવન! - Jay Vasavda

માત્ર હાજરી નોંધાવવાના અભિગમથી સાવ ખોટો સમય બગાડી, નાણા ઉડાડી... બીજા અગત્યના અવસરો જતા કરી લગ્ન, મરણ જેવા પ્રસંગોમાં ઉમળકા વિના સાગમટે ઉપડી જઈને આપણે જાતને જ છેતરીએ છીએ

પ્રકૃતિને પરિવર્તન ગમે છે. માણસ એક જ એનું એવું અળવીતરું સંતાન છે જેને લાભ કે ભય વિના કશું બદલવું કે બદલાવવું ગમતું નથી. નવી દુકાનનું જ ઉદ્ધાટન થાય? નવા જીવનનું ઉદ્ધાટન પણ થઈ શકે ને! કરવી છે, શરૃઆત? ધેન બ્રેક ફ્રી! ઉખાડી ફેંકો આટલી જડસુ જૂની વાતોને જીંદગીમાંથી... વધાવો કુશળમંગળને કંકુચોખાથી! હિઅર ઈઝ ધ લિસ્ટ.
(૧) 'અમારો કુળદીપક/કુળદીપિકા ૧૦મા/૧૨મા/ટી.વાય.માં છે, એટલે અમે તો ઘરમાંથી કેબલ કનેક્શન જ કઢાવી નાખ્યું છે.'
આ વાક્યના આયુષ્યનો અંત તો દસ વરસ પહેલા ૨૦૦૫ની સાલમાં વાઈફાઈ નેટ અને સ્માર્ટફોનના ભણકારા સાથે જ આવી ગયો હતો. જુઓ, ચિરંજીવી કુમાર કે કુમારીને ટીવી જોવું ગમતું જ ન હોય (કે પોસાતું ન હોય) તે એક વાત થઈ. બાકી, કેબલ શા માટે ટીવી જ કાઢી નાખો ને! અરે, ઘર જ કાઢી નાખીને ટાપુ ઉપર જતા રહો. ૧૦ ટકા માર્કસ એકાંત તપસ્યાથી વધુ આવશે! વાત આપણે કરીએ છીએ સંતાનોના ભણવાની. ભણવું એટલે શું માર્કશીટ? અભ્યાસ એટલે ગોખણપટ્ટી? જો આપણા બાબાશ્રી કે બેબીશ્રીને ટીવી ક્યારે ચાલુ કરવું અને ક્યારે બંધ કરવું (કે તેમાં શું જોવું?) એ સમજ જાતે ન પડતી હોય તો એ દસમા, બારમા ધોરણમાં નહિ, બાલમંદિરમાં ભણે છે - એમ કહેવાય. નાનકડાં ભૂલકાંઓને આપણે શું ખવાય, શું ન ખવાય... કેમ કપડાં પહેરાય અને કેમ ટોયલેટ જવાય એ શીખવતા નથી? એમને ભરચક્ક ટ્રાફિકમાં વાહન ચલાવવા આપતા નથી? તો પછી ટીવી સિનેમા સાથે કામ પાર પાડવાની સમજદારી કેમ કેળવતા નથી?
કારણ કે, આપણે ખુદ એ તાલીમ મેળવતા નથી. ટીવીનો છેડો ખેંચી લેવાથી શું થશે? મનોરંજન તો હવે મોબાઈલ સુધી પહોંચી ગયું છે. કેટલા કનેક્શન કાપવા જશો? અને જો ટીનએજર યુવક/યુવતીને પોતાના સારાસારના વિવેક માટે જાતે નિર્ણય કરતાં અને સાચી પસંદગી કરતા ન શીખવી શકીએ - તો પછી એ જે માર્કસના સૂંડલા ઉસેડી લાવે એ શિક્ષણની કિંમત જૂતાં પાલિશ કરવાના બ્રશ જેટલીયે ન ગણાય. વળી, ટીવી, ઈન્ટરનેટ કે મિડિયાના અભાવે જે જનરલ નોલેજનો કૂવો નપાણિયો રહેશે તેનું શું?
(૨) ''અમને તો ચાઈનીઝ/પંજાબી/થાઈ/મેક્સિકન/કોન્ટિનેન્ટલ બહુ  ભાવે!''
ભાવે તો ખાવ, પીઓને જલસા કરો. પણ એમાં ગુજરાતી થાળીને શા માટે 'ડાઉનમાર્કેટ' કરો છો? અને ખરેખર ભાવે છે કેમ પછી, દુનિયાને એ ફાવે છે માટે આપણા પેટમાં આ બધું આવે છે? મોટા ભાગે આ બધાં જ ફૂડમાં (સાઉથ ઈન્ડિયનના અપવાદ સિવાય) વાસી પેસ્ટની રેડીમેઈડ ગ્રેવી હોય છે - જેમાં દસ પ્રકારના શાકનો સ્વાદ એક પ્રકારનો જ આવતો હોય છે! ચીનમાં ક્યાંય ફાફડાની લારી છે? ઈટાલીમાં બટાકાવડાનો ખૂમચો છે? સીધેસીધો રોટલો ને માખણ ખાતા વળી ચૂંક આવે છે કે 'ફ્રેન્કી'ના નામે એના ટુકડા ચાવવા પડે. વાત કંઈ વિદેશી સ્વાદના વિરોધની નથી. વાત દેખાદેખીમાં આગવી અને અનોખી 'આઈડેન્ટીટી' સદંતર ગુમાવી દેવાની છે. ગિફ્ટમાં કેડબરી જ કેમ અપાય? ગોળ-ઘીની ચકાચક સુખડીના ચકતાં કેમ નહિ? ચોલકેટ થીકશેઈક ગટગટાવો, પણ થાબડીના ચોસલા ચાવવામાં તે વળી શું બિનજામીનપાત્ર અપરાધ થઈ જાય છે? મકાઈ પણ અમેરિકન હોય તો જ અન્નનળીના સ્નાયુઓ સ્વીકારે? માંડવીના ઓળા ખાવ કે તાજી છાશ પણ પીવો અને મૂડ આવે તો કોલા ડ્રિન્ક જમાવો. પણ એકની પાછળ બીજાને સાવ ભૂલીને ઉતારી ન પાડો!
(૩) ''અમે તો ફિલ્મ બતાવે એવી વોલ્વોમાં જ મુસાફરી કરીએ છીએ''
લકઝરી બસ બરાબર. વોલ્વોમાં ફરો. એ.સી. બસમાં બેસો. પણ આ બસમાં રહેલા ડીવીડી-ટીવી પ્લેયરથી મોટું સામાન્ય બુદ્ધિનું કોઈ જાહેર અપમાન નથી. ફ્લાઈટની માફક મન પડે તો કાનમાં હેડફોન ભરાવી પડદા પર ચાલતા જે-તે પિક્ચરની મજા માણવી હોય તો હજુયે ઠીક છે. દરેક સીટ પર વાંચવા માટે લેમ્પ કે સાંભળવા માટે મ્યુઝિકની સુવિધા મળતી હોય એનાથી રૃડું શું? પણ આ તો ચાર કલાકની મુસાફરીમાં સાડા સત્યાવીસ વખત જોયેલી ફિલ્મ ગમે તેટલી ઘસાયેલી પ્રિન્ટ અને તરડાયેલો અવાજ હોય, તો પણ ટાઈમપાસ કરવા જોવી એટલે જોવી જ! વળી, પાઈરેટેડ પ્રિન્ટ હોય એટલે કાયદાનો સરેઆમ ભંગ! આપણા મુસાફરોને સફરમાં પુસ્તક સાથે બાપે માર્યા વેર હોય છે, એટલે કોઈ બસમાં સીટ પર લાઈટ ચાલુ હોતી નથી. પણ પોતાની મજા માટે બીજાને ત્રાસ આપવામાં એમની ધર્મપરાયણતા અપવિત્ર નથી થતી. એકદમ અલેલટપ્પુ અળસિયાઓ પણ એકની એક ફ્લ્મિો કેટલીવાર જોઈ શકે? એના કરતા તો માળા-તસ્બીના મણકા ગણવા સારા! એકલપંડે થાય નહિ પણ જો હૈયે રામ વસે તો સાગમટે આવા વરવા મનોરંજક તમાશા સામે તત્કાળ અસરથી વિરોધ નોંધાવી એ બંધ કરાવી દિમાગની ખેંચાઈ જતી નસોને લીધે ટૂંકાવાઈ જતું એક-બે વરસનું આયુષ્ય જરૃર બચાવવું.
(૪) ''હલ્લો, તમારા મોબાઈલ પર હું કોણ બોલું છું, ઓળખો જોઈએ?''
બોલે શું? પડો ચૂલામાં! આવી રમત ફિક્સ્ડ લાઈનના ફોન પર થાય એ હજુ ય બરાબર... એમાં તમે ફોન કરો ત્યારે સામી વ્યક્તિ જે-તે ઓરડામાં કે ઓફિસમાં જ છે, એટલું તો નક્કી છે પણ મોબાઈલ ફોન 'મોબાઈલ' માણસો જ વાપરતા હોય છે. તમને મસ્તીનો કરન્ટ ચડયો હોય, ત્યારે તમારો ફોન ઉપાડનાર ટ્રેનના ડબ્બા પર એક હાથે લટકતો હોય એ શક્ય છે. આમ તો, અડધી રાત્રે દરવાજા ખખડાવવાનો અંગત સંબંધ ન હોય, તો હંમેશા સેલફોન પર વિવેકપૂર્વક સામી વ્યક્તિની લાંબી વાત માટેની અનુકૂળતા પૂછી લેવી જોઈએ. એમાંય જો સામી વ્યક્તિ કોઈ ફિલ્મ કે કાર્યક્રમમાં હોય તો તરત જ પછી ફોન કરવાનો ટાઈમ પૂછી (અને એ બરાબર પાળીને) 'કઈ ફિલ્મ? કોણ સાથે છે?' એવા સવાલોની કવ્વાલી લંબાવવાને બદલે તત્કાળ વાત ટૂંકાવી નાખવી જોઈએ. સામાન્ય રીતે બપોરે, વહેલી સવારે અને મોડી રાત્રે નિકટ પરિચય વિના સામાન્ય મુદ્દા માટે ફોન કરવા 'આઉટ ઓફ કર્ટસી' ગણાય છે. એમાં ય ફોન કરનાર પોતાનું નામ પહેલાં બોલે એ તો બેઝિક ફોન મેનર્સ છે. સારુ છે, પેલા ભૂલાઈ ગયેલા કોમેડિયન નવીન પ્રભાકરની સ્ટાઈલમાં ફોનમાંથી કોઈ બે હાથ આંખ પર દબાવી 'પહચાન કૌન?' પૂછતું નથી. પૂછે તો એને એક કરાટે ચોપ મારીને ભોંયભેગો કરવાથી એનું પગના તળિયે પહોંચી ગયેલું ભેજું ફરી યથાસ્થાને એટલે કે મસ્તકમાં ગોઠવાઈ શકશે.
(૫) ''શું થાય? ત્રેવડ નથી, સમય નથી... પણ વ્યાવહારિક કામે તો જવું પડે ને! એમાં આપણું કંઈ થોડું ચાલે? સમાજને માઠું લાગે!''
નામ વ્યાવહારિક કામનું... અને આટલી બધી 'અવ્યાવહારિક' વાસ્તવિકતા? જીવનના ૭૦ ટકા કહેવાતા વ્યાવહારિક કામો એવા હોય છે કે જીવનની સમી સાંજે એનું જમા-ઉધાર તપાસો તો ફૂટી બદામનું ય નફો-નુકસાન ન થયું હોય! આપણે 'વ્યવહાર' અને 'ઔપચારિકતા' વચ્ચેનો તફાવત હજુ સમજ્યા નથી. કોઈએ કશુંક કર્યું હોય અને આપણને ન્યૂટનના નિયમ મુજબ એ એક્શનનું બમણું રિએક્શન આપીએ, તે વ્યવહાર! પણ માત્ર પરંપરા, નિયમ, સામાજીક દબાણ કે પાંચમાં પૂછાવાના હેતુથી જે કરીએ, એ તો છે કેવળ ભાર! હા, ફુરસદના ફડાકા મારતા હો... રૃપિયાના મોજેમોજાં પગ પખાળતા હોય, પરિવારની કે જાત પ્રત્યેની બીજી જવાબદારી જ ન હોય ત્યારે માખીઓ મારો કે વ્યાવહારિક પ્રસંગોમાં હાજરી પુરાવો... જે મન પડે તેમ કરો, પણ માત્ર હાજરી નોંધાવવાના અભિગમથી સાવ ખોટો સમય બગાડી, નાણા ઉડાડી... બીજા અગત્યના અવસરો જતા કરી લગ્ન, મરણ જેવા પ્રસંગોમાં ઉમળકા વિના સાગમટે ઉપડી જઈને આપણે જાતને જ છેતરીએ છીએ. થોડાક સ્પષ્ટવક્તા બની જશું, મક્કમપણે અને કોઈ સ્વાર્થ વિના ખરી સચ્ચાઈથી ના પાડતાં શીખી જઈશું.. તો ધીરે ધીરે એક મજબૂત અને અનુકરણીય છાપ બની જશે. પછી લોકો એ સ્વીકારશે. અને ધારો કે, ન સ્વીકારે... ટીકા કરે.. કટાણું મોં કરી, માઠું લગાડી, મહેણાં મારે... તો વિચારજો કે આવા લોકોના સન્માન ખાતર આપણા જીવનની અમૂલ્ય પળોનો ભોગ દેવાનો? વાતેવાતમાં વાંકું પડી જતું હોય એવા સંબંધોને સીધી રીતે જ ખોઈ નાખવાથી રાહત થશે. ભલું થયું ભાંગી જંજાળ, રમાડો કુટુંબના બાળગોપાળ!
(૬) ''દીકરીની જાત, એટલે પછી થોડીક મર્યાદા રાખવી પડે ને, શું થાય આપણા ખાનદાની સંસ્કાર લાજે''
સંસ્કાર કે માન કે શિસ્તને આદર આપવાની વાતને વળી પુલ્લિંગ અને સ્ત્રીલિંગ વિભાગો હોય? એ તો છોકરા, છોકરી બંનેને સરખા જ લાગુ પડે! શારીરિક દેખાવની ભિન્નતા હોય, બરાબર છે. માનસિક સંવેદનોના આવેગો ક્યાંક જુદા પડે, દેખીતું છે. પણ ખાના, પીના, જીનામાં સ્ત્રી-પુરુષ વચ્ચે કશોય તફાવત નથી. હોવો પણ ન જોઈએ. મૂળ તો આદિકાળથી જ પુરુષપ્રધાન સમાજ સ્ત્રીને ઢોરઢાંખર કે ઘરવખરી જેવી જ મિલ્કત સમજતો રહ્યો છે. સ્ત્રી સામે ચાલીને સમર્પિત થાય, એ એની મરજીની વાત છે અને એને પરાણે ગુલામ બનાવી નજરકેદ રાખવી એ રીતસરનો અત્યાચાર જ છે.
છોકરી છો? બહાર ફરવા જવામાં - ફિલ્મ જોવામાં નિયંત્રણ! અને જે આવારા રખડુઓની બીકે પહેરવા-ઘૂમવા-નાચવા પર આ નિયંત્રણો આવે છે - એ મવાલીઓને શું મળે છે? ખુલ્લી આઝાદી! ગુનેગારને ગોળ, નિર્દોષને ખોળ! છોકરીને રેલ્વે-બેન્ક-મિકેનિકલ કામો ન સમજાવાય, એણે તો મોટા થઈને સાસરે જવાનું છે ને! કેમ? સાસરું શું મંગળના ગ્રહમાં હશે? એક માતા સો શિક્ષકની ગરજ સારે, એમ કહેવું (તો એક પિતા શું સો રાક્ષસની ફરજ નિભાવે?) અને માતાને માત્ર પુસ્તકિયા જ્ઞાાનથી જ ભણાવ્યા કરો, તો એ ભાવિ બાળકનું 'ગણતર'ના 'ચણતર'થી 'ઘડતર' કઈ રીતે કરી શકશે? સ્ત્રી રજઃસ્વાલા થાય છે, માટેસ્તો માતા બની શકે છે, છતાં કફ કે શ્વાસ જેવી જ આ સ્વાભાવિક, પ્રાકૃતિક, વૈજ્ઞાાનિક ક્રિયા અસ્પૃશ્ય કે અપવિત્ર આજે ય ગણાય. અને પાછા આપણે જગદંબાની ભક્તિની વાતો કરીએ! વસ્તુના વ્યાપારીકરણનો વિરોધ કરીએ અને 'છોકરી જોવા' જતો મૂરતિયો નવા મોડલની કારની જેમ ડેમોન્સ્ટ્રેશન લે (માત્ર પરિચય કેળવવો હોય તો ફોન પર થાય, જોવાનું એટલે શરીર, એ ય ઢંકાયેલું જોવાનું સાહેબો!) એ પ્રક્રિયાને આપણે 'કન્યાદાન'ની સોદાબાજીની ગોઠવણ કહીએ!
(૭) ''અરે, ઘેર આવો અત્યારે... જમ્યા વિના/નાસ્તા વિના/ઠંડા વિના જવાતું હશે કંઈ?''
આમ તો આપણે કોઈને સો રૃપિયા પણ ઉધાર આપવાની ઉદારતા રાખતા નથી. ખરેખર પ્રેમ હોય તો એ સામા માણસની લાગણીઓને આદર આપીને, એની ખુશી અને સમયને માન આપીને, એની મરજીને માથે ચડાવીને (પોતાની ઈચ્છાઓના ભોગે પણ) જ સાબિત કે પ્રદર્શિત કરી શકાય. પણ આપણે ત્યાં 'ઘેર ક્યારે આવો છો? જમવા ક્યારે આવો છો? નાસ્તા વિના જવાય જ નહિં ને!'નો જીવલેણ ચેપી વાઈરસ ઘૂમી રહ્યો છે. વધુ ખાવાથી રોગ થાય છે, ઓછું ખાવાથી તો આરોગ્ય સુધરીને રાતી રાયણ જેવું થાય છે! આ તો રીતસરનું ટેરરિઝમ જ છે. જમાનો ટેકનોલોજીકલ પ્રગતિનો અને કોમ્યુનિકેશન ક્રાંતિનો છે. સંપર્કસેતુ માટે તો ફોનની શોધ થઈ છે. પછી ઘેર-દુકાન પર જવાથી જ (એ ય બે-પાંચ-મિનિટ નહિ, કલાકો!) કંઈ હીરા-મોતી ટંકાઈ જાય? ઉત્સાહ હોય એ સામેથી આવે. પરાણે કોઈ ધર્મધુરંધરની જેમ 'પધરામણી' ગમતી વ્યક્તિને અણગમતો સમયનો વેડફાટ જ છે. અને જમવું કે ના જમવું? શું અને કેટલું-ક્યારે ખાવું એ શુદ્ધ વ્યક્તિગત નિર્ણય છે. એમાં માણસને સ્વતંત્ર ન કરો, તો પછી દેશની આઝાદીનો મતલબ શું? માણસને એનું કામ અને એનો આરામ બંનેની ખુલાસા વિનાની પસંદગીનો હક છે. અત્યંત અંગત સંબંધો અને વિના ઘેર બોલાવી ખવડાવવાના ધખારામાંથી મુક્ત કરી - સામા માણસની ક્રિએટિવ સ્પેસને સલામી આપશો, તો વધુ પ્રિયપાત્ર બનશો!
ઝિંગ થિંગ

આપણે લગ્નના ફુલેકાં-જમણવાર પાછળ જેટલું બજેટ ખર્ચાય છે, એટલામાં હનીમૂન માટે નવયુગલ સ્વીત્ઝર્લેન્ડ જઈ આવતું હોત તો!

Monday, February 1, 2016

દિકુ અને જબરી... ... ... !!!

દિકુ... ... ... અને... ... ...  જબરી... ... ... !!! !!! !!!

'એય દિકુ, સુઈ ગયો કે શું?'
'
ના હવે, બોલને જાગુ જ છું.'
'
ઊંઘ નથી આવતી થોડીક વાર વાતો કરને મારી સાથે.'
'
જો યાર, તને ખબર તો છે કે મને ટાઈપ કરવાનો કંટાળો આવે છે. તું કહેતી હોય તો કોલ કરું?'
'
ઓકે ચલ કોલ કર..'
રીંગ વાગતા જ ઊપાડેલો કોલ કલાક સુધી એકબીજાની અને ઘરની, મિત્રોની વાતોમાં પસાર થઈ ગયો. ખબર જ ના રહી કે રાતના એક વાગ્યા.
'
એ જબરી, તું બગાસા ના ખાઈશ હો, નહીંતર હું ફોન મૂકી દઈશ.'
'
ના ના, હું જાગુ જ છું ને. એક કામ કર, આપણે બહુ દિવસોથી સાથે મ્યુઝિક નથી માણ્યું. ચલ હો જાયે. ત્યાંથી કિશોર અને અહીંથી લતા.'
'
વાહ ચલ હો જાયે. પણ ગઝલનો પણ મૂડ છે. તો જે દિલમાંથી નીકળે એ જ...'   ઓકે ડન
અને સીસ્ટમ ઓન કરીને અમારી ફેવરીટ ગઝલ શરૂ કરી, સાથે ધીમા અવાજે લલકારી,
'
કીસી નઝર કો તેરા ઈંતઝાર આજ ભી હૈ'
આહા, એ પૂરી થતાં પહેલાં જ દિકુએ મારી ફેવરિટ શોધીને તૈયાર જ રાખી હતી
'
તુ તુ હૈ વહી, દિલને જીસે અપના કહા'
અને બંને તરફથી ગીત અને ગઝલ વગાડવાનો અને સાથે ગાવાનો સીલસીલો ચાલ્યો.
'
તેરે બીના જીંદગી સે કોઈ શીકવા તો નહીં'
'
તેરે સીવા ના કીસીકા બનુંગા યે વાદા રહા દિલરુબા
'
હમે તુમસે પ્યાર કિતના યે હમ નહી જાનતે'
'
તેરે લીયે હમ હૈ જીયે હોઠો કો સીયે'
'
હાં હંસી બન ગયે હાં નમી બન ગયે
તુમ મેરે આસમાન, મેરી ઝમી બન ગયે....'
'
ઓય....હવે મને રડાવીશ કે શું....!'
'
કેમ? શું થયું? અરે આ મારું ફેવરીટ ગીત છે. જ્યારે જ્યારે તું બહુ જ યાદ આવે ત્યારે આ ગીત સાંભળુ છું. પણ એમાં તને કેમ રડવું આવે? હું સમજી નહી.'
'
છેલ્લા ત્રણ દિવસથી હું પણ સતત આ જ ગીત સાંભળુ છું. ખબર નહી કેમ, પણ બહુ જ સ્પર્શે છે આ ગીત'.
અને હું ગાઈ ઊઠી,
'
મૈં જાન યે વાર દું, હર જીત ભી હાર દું.
કીમત હો કોઈ તુઝે, બેઈંતહા પ્યાર દું...
સારી હદેં મેરી, અબ મૈંને તોડ દી, દેકર મુઝે પતા, આવારગી બન ગયે...'
'
એ જબરી, બસ હવે...પ્લીઝ...તું મને આટલો પ્રેમ શું કામ કરે છે...!?'
'
ખબર નથી, દરેક વાતનું કારણ નથી હોતું. બસ એટલું ખબર છે કે હવે તું છે તો હું છું, આ ખોળીયામાં જીવ પૂરનારો તું છે. તું નહી તો જીવ નીકળી જશે અને રહી જશે એ જ નિષ્પ્રાણ ખોળીયું'
'બ્યાહ કીયા તેરી યાદો સે, ગઠબંધન તેરે વાદો કા... બીન ફેરે હમ તેરે...'
અને બસ હવે તુ અને હું... ... ... દિકુ અને જબરી